एकोहम्
— रामधारी सिंह 'दिनकर'

एकोहम्

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 दानव से छोटा नहीं,

न वामन से बड़ा हूँ।

सभी मनुष्य एक ही मनुष्य हैं।

सबके साथ मैं आलिंगन में खड़ा हूँ।


वह जो हार कर बैठ गया,

उसके भीतर मेरी ही हार है।

वह जो जीतकर आ रहा है,

उसकी जय में मेरी ही जयजयकार है।


मैं ही दाना डालने वाला बुड्ढा रईस हूँ।

मैं ही वह पक्षी हूँ, जो दाना चुगता है।

बैल की पीठ पर बेरहमी से बेंत मत मारो।

मेरी पीठ पर उस का निशान उगता है।


पत्ता का पीला होना

पूरे वृक्ष का रोग है।

यह मात्र संयोग है

कि एक पत्ता पीला है, बाक़ी हरे हैं।


एक व्यक्ति पातक इसलिए करता है

कि सब के भीतर पाप के भाव भरे हैं।

जहाँ भी पुण्य की वेदी है,

मैं अगरु का धुआं हूँ,

मण्डप से झूलता हुआ

फूलों का वन्दनवार हूँ

और जो भी पाप करके लौटा है,

उसके पातक में मैं बराबर का हिस्सेदार हूँ।


एक उपकारी सबके गले का हार है।

और जिसने मारा या जो मारा गया है

उनमें से हर एक हत्यारा है,

हर एक हत्या का शिकार है।